फिर वही गलियाँ

फिर चले आए उन्ही गलियों में जहाँ से कभी रोज़ गुज़रते थे ।

वक़्त बहुत बीत चला, वो गलियाँ कुछ बदल सी गयी हैं ।

ना आने की क़सम ले कर चल पड़े थे यहाँ से ये क़दम ।

आज आँखों के कोनों से आँसू वहीं बिखरने को बेताब हैं ।

जाने क्या थी बात यहाँ पर, आज दिल में फिर कुछ वही हलचल है ।

Wo Chanchal pal

जानते थे उन पलों के भाग जाने की फ़ितरत थी , फिर भी पकड़ने की बहुत कोशिश करी हमने ।

हाथ तो आयीं कुछ यादें , पर वो समय फिर बाज़ी मार ही गया ।

मुझे नहीं पता प्यार क्या है

मुझे नहीं पता प्यार क्या है पर कभी-कभी कहीं-कहीं उस प्यार की झलक ज़रूर देखी है,

वो दादी की कहानियों में,

वो नानी के हाथ के बनाये आटे के लड्डुओं में,

वो नाना की रोज़ दिलाई हुई टॉफ़ियों में,

वो पापा के सर पर फिराए हाथ में,

वो मम्मी की रोटियों में, वो मौसी की आती कॉल में ,

वो बुआ के आशीर्वाद में,

वो बच्चे की मुस्कराहट में।

मुझे नहीं पता प्यार क्या है पर महसूस किया है कभी-कभी कहीं-कहीं उसकी खुशबू को।

पहली बारिश

branch-environment-green-751005Photo by brazil topno from Pexels

बहुत गरमी पड़ रही थी उस साल , जून का महीना था और मानसून के आने का सब को बेसब्री से इंतेज़ार था। दिल्ली जैसे शहर में किसी का काम रुकता नहीं है पर ये गरमी सबको बदहाल ज़रूर कर देती है। ज़रूरत थी तो एक अच्छी बौछार की जो पूरी दिल्ली को ठंडा कर दे। भले थोड़ी देर के लिए ही सही।

आज मौसम थोड़ा नरम था, बादल हो रहे थे पर पसीना भी पूरा आ रहा था। मौसम विभाग वालों ने बोला था कि आज मानसून की पहले वाली बारिश होगी। पर मौसम विभाग वालों पर विश्वास कर पाएँ ऐसा आज तक हुआ नहीं था। ये बस देखने की बात थी की आज बारिश होगी कि नहीं।

वंदिता, एक पच्चीस साल की लड़की जो अपनी नौकरी से तंग हो कर नयी नौकरी की तलाश में थी इंटर्व्यू दे कर लौट रही थी। इंटर्व्यू था तो कपड़े भी अच्छे पहने थी बेचारी तो उसे परेशानी भी कुछ ज़्यादा ही हो रही थी। दिल्ली की मेट्रो की भीड़ में पिच पिच पर खड़े हो कर किसी तरह अपने कमरे तक जाने का सफ़र तय कर ही रही थी।

वंदिता ने अपने ओफ़िस के पास कमरा ले रखा था जो तीसरी मंज़िल पर था, ऊपर कोई और मंज़िल नहीं थी तो उसका कमरा काफ़ी गरम रहता था। उसके माँ-पापा ने कहा था उसे कि ऐ सी लगवा ले पर उसको अकेले कमरे में ऐ सी लगाना समझ नहीं आता था, वो तो अपना काम पंखे और इग्ज़ोस्ट फ़ैन से चला लेती थी। कभी ज़्यादा ही गरमी लगती तो परदों पर पानी डाल लेती थी।उसे पसंद था अपना कमरा। बाहर निकल कर कुर्सी लगा कर बैठ जाती थी और मौसम का मज़ा लेती थी। कभी चाय की प्याली होती थी उसके हाथ में, कभी किताब और कभी कभी गाना सुनने के लिए हेड फ़ोन। वो जब भी ऑफ़िस से जल्दी आती थी बाहर आ कर बैठ जाती थी। उसे सुकून मिलता था वहाँ शांति में बैठने से। वो जहाँ रहती थी वहाँ और लड़कियाँ भी घर ले कर रहती थी पर वहाँ शोर गुल शुरू रात में ही होता था जब सब आ जाते थे, उससे पहले वो जी भर के शांति के मज़े लेती थी। सुकून से चल रही थी उसकी ज़िंदगी, नौकरी भी अच्छी चल रही थी।

पर कुछ दिन पहले ही उसकी ज़िंदगी में सब कुछ बदल गया था, उसका मैनेजर जो कुछ दिन पहले तक था उसने उसे परेशान कर दिया था। काम तो वो अब भी अपने हिसाब से अच्छा कर रही थी पर मैनेजर को काम अपने ही हिसाब से चाहिए होता था। वंदिता को भी काफ़ी समय बीत गया था कम्पनी में काम करते करते और कुछ जगह वो भी जानती थी काम कैसे होगा बस इसी बात पर एक बार उसकी अपने मैनेजर से तनातनी हो गयी थी। मैनेजर तब तो कुछ नहीं बोला था पर साल के अंत में उसने उसे सबसे कम इज़ाफ़ा दिया था। वंदिता को ये मंज़ूर नहीं था। तभी उसने मन बना लिया था नौकरी छोड़ने का।

आज उसका मूड ज़्यादा ख़राब था, जहाँ इंटर्व्यू दे कर आयी थी वहाँ पूरा दिन लग गया था। शुरू में तो सब सही जा रहा था पर आख़िर तक वो इतनी थक गयी थी की उसे कुछ भी समझ आना बंद हो गया था। उसे पूरा यक़ीन था की उसका इस कम्पनी में नहीं होने वाला है। कम्पनी अच्छी थी और वो भी चाहती थी की उसे मौक़ा मिले उसमें काम करने का पर आज उसे अपना वो सपना भी टूटता लग रहा था। ऐसे आज तक कई सपने टूट गए थे उसके । जब से ये दूसरी कम्पनियों में इंटर्व्यू देने शुरू किए थे , वंदिता इंटर्व्यू के लिए जाने से पहले वो कम्पनी से जुड़ जाने के सपने देख ही लेती थी। कहते हैं ना अगर सपने देखो तो सच भी हो जाते हैं। उसे क्या पता था कि नौकरी इतनी आसानी से नहीं मिल जाती है । काफ़ी सारी कम्पनी उसे मना कर भी चुकी थी। पर कुछ उम्मीद अब भी थी, कुछ थी ऐसी कम्पनी जो उसे बुला सकती थी, जिनका जवाब अभी तक ना तो “ना” में आया था और ना ही “हाँ” में।

कल जब उसने अपनी छुट्टी के लिए बोला था, तो मैनेजर ने उसे बोल दिया था की तुम कुछ ज़्यादा ही छुट्टियाँ ले रही हो। ऐसे ज़्यादा छुट्टियाँ लेने से बाक़ी लोगों पर भी ग़लत असर पड़ता है, कम लिया करो। पुराना मैनेजर तो अब बदल गया था और ये मैनेजर बुरा नहीं था। पर अब वो मन बना चुकी थी तो एक और साल अब इस कम्पनी में वो नहीं काट सकती थी। बस यही चाहती थी कहीं से कुछ तो बात बन जाए।

जब वंदिता मेट्रो स्टेशन से उतरी तो मौसम अच्छा और ठंडा हो रहा था। उसका मन किया वो पैदल ही घर तक पहुँच जाए। उसे बारिश का मौसम ख़ास पसंद था। ठंडी ठंडी हवाएँ,काले  बादल, लहराते पेड़ – ये सारे सुख जो इस मौसम में थे और किसी मौसम में कहाँ मिलते थे। वो अपने घर से दस मिनट दूर थी तभी बादल बिलकुल काले हो गए, वंदिता समझ गयी थी बारिश अब कभी भी हो जाएगी। तभी बिजली कड़की और बारिश होने लगी। वंदिता के बस्ते के साथ एक और कपड़ा था जिसे लगा दो तो वो भीगता नहीं था । उसने वह कपड़ा लगाया और अपना फ़ोन भी अंदर लगा दिया। और याद कर रही थी वो पल जब वो अपने पापा के साथ ये बसता लेने गयी थी। वह ऐसा बारिश में ना भीगने वाला बसता नहीं लेना चाहती थी क्यूँकि थोड़ा महंगा था पर उसके पापा ने उसे ये कह कर दिला दिया था कि वहाँ अकेली रहेगी, बारिश हुई तो काम आएगा। उसने ले लिया था। वंदिता सोच रही थी की वो अपने पापा को शुक्रिया ज़रूर कहेगी आज।

वंदिता को बारिश में भीगते हुए बहुत मज़ा आ रहा था, बहुत अच्छी लग रही थी वो सौंधी सौंधी ख़ुशबू जो मिट्टी से आ रही थी जैसे की मिट्टी भी कह रही हो ” बहुत तप ली, आज जा कर ठंडक मिली है।” जब उसके रास्ते में पड़ने वाले पेड़ भी बरसात में धुल कर साफ़ और हरे भरे लग रहे थे तो वंदिता को ऐसा लग रहा था जैसे उसकी दुनिया में कोई फ़िक्र ही नहीं है। वो बारिश में अच्छे से भीगते हुए, ज़मीन पर पड़े हुए पानी में छप छप करती हुई एक छोटी सी बच्ची की तरह महसूस कर रही थी। याद कर रही थी वो समय जब उसकी माँ बारिश आने वाली है ये देखते ही छत पर भाग पर कर सारा समान समेटने लगती थी – वहाँ सूख रहे कपड़े, वहाँ पड़ी कुर्सियाँ और ना जाने क्या क्या। वो बेचारी तो परेशान होती थी पर वंदिता छत पर भागती थी उन पहली बूँदों से खेलने के लिए। उसकी माँ भी उसे देख कर ख़ूब ख़ुश होती थी और कभी कभी उसके साथ भीगती भी थी। पर हाँ उसके बाद नहा कर कपड़े बदलने की बहुत जल्दी रहती थी उन्हें की कहीं वंदिता की तबियत ना ख़राब हो जाए। आज उसी दुनिया में चली गयी थी वंदिता। और मज़े ले रही थी उस भूले बिसरे बचपन का और इन मोटी मोटी बूँदो का जो उसके माथे पर टपक कर उसे अपने माँ का आँचल याद दिला रही थी।

भीगते भीगते वो घर आ गयी , बस्ते को नीचे रखते हुए उसने अपना फ़ोन उठाया और अपने घर पर लगा दिया। उसकी माँ ने फ़ोन उठाया – वंदिता ने अपनी माँ को सबसे पहले ये बोला “माँ , आज यहाँ बारिश हो रही है, कितने दिनो बाद। मैं तो जी भर के भीग भी ली।” तभी उसकी माँ ने उसे पहले कपड़े बदल लेने को कहा।

वंदिता नहा धो कर कपड़े बादल कर फिर अपनी माँ को फ़ोन लगाने का सोचने लगी तभी उसने देखा फ़ोन बज रहा है। उसने सोचा माँ होंगी पर फ़ोन किसी अज्ञात नम्बर से था। वंदिता ने फ़ोन उठाया तो पता चला उस कम्पनी से था जहाँ वो पंद्रह दिन पहले इंटर्व्यू दे कर आयी थी। उन लोगों ने कहा था वो २ हफ़्तों में बताएँगे। वो लोग उसे अपने यहाँ नौकरी देना चाहते थे। वंदिता ने उनसे सारी बातें की और फ़ोन रख दिया। उसे यक़ीन नहीं हो रहा था की आज वह पहली बारिश से भी ख़ुश थी और आज ही उसे ये नौकरी मिलने की ख़बर मिली थी। उसने सबसे पहले फ़ोन बिस्तर पर फेंक कर भगवान का शुक्रिया किया । फिर उसी उत्साह के साथ  अपने घर फ़ोन लगा दिया “माँ, आज मुझे तुम लोगों की बहुत याद आ रही है। आज ही पहली बारिश हुई और आज ही मुझे नयी नौकरी भी मिल गयी। मैं बहुत ख़ुश हु माँ, इस बारिश ने सच में मेरे मूड को हरा भर कर दिया”

तभी ये बात माँ ने फ़ोन के पास खड़े वंदिता के पापा को भी बता दी। उन दोनो के चेहरे पर संतोष-भरी मुस्कान थी। कई दिनो बाद आज उनकी बेटी ने उनसे अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की थी।

 

 

ज़िंदगी – मिलने बिछड़ने का सफ़र

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ज़िंदगी के इस हसीन सफ़र में मिलना और बिछड़ना तो लगा ही रहेगा ।

बस इतना इत्मिनान रहे कि मिले तो ख़ुशी से और बिछड़े तो फिर मिलने की उम्मीद से।

हर रिश्ता  उम्र भर का होगा तो नहीं, पर इतना तो गुमान रहे कि कोशिश पूरी थी।

धुँधली यादें

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unsplash-logoDenny Müller

समय की परतों में छुपी हुई धूल खा रही वो यादें कभी कभी यूँ ही सामने आ जाती हैं और ले आती हैं उन यादगार लम्हों का वो तूफान जो कभी हँसा जाता है तो कभी रुला जाता है ।

कुछ बदनसीब यादें

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बहुत सहेज कर रखे थे वो पल , सोचा था याद बन कर सामने आएँगे तो दिल को फिर गुदगुदाएँगे।

पर कुछ बदनसीब यादें ऐसी भी थी जो सुकून का वादा कर, अपने साथ वो बवंडर ले आयी थी जो सब कुछ तहस-नहस करने पर आमादा था।