फिर वही गलियाँ

फिर चले आए उन्ही गलियों में जहाँ से कभी रोज़ गुज़रते थे । वक़्त बहुत बीत चला, वो गलियाँ कुछ बदल सी गयी हैं । ना आने की क़सम ले कर चल पड़े थे यहाँ से ये क़दम । आज आँखों के कोनों से आँसू वहीं बिखरने को बेताब हैं । जाने क्या थी बात …

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Wo Chanchal pal

जानते थे उन पलों के भाग जाने की फ़ितरत थी , फिर भी पकड़ने की बहुत कोशिश करी हमने । हाथ तो आयीं कुछ यादें , पर वो समय फिर बाज़ी मार ही गया ।